Sep 17, 2014

'मैं सुपर स्टार बनने के लिए काम ही नहीं करता' (साक्षात्कार)

    संगीत की साधना, क्रिकेट का फैशन, अभिनय का शौक या अब राजनीति का रंग, इन सब चरित्रों में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले व्यक्तित्व का नाम है, मनोज तिवारी ‘मृदुल’। मनोज तिवारी ‘मृदुल’ का नाम आज अनायास ही सबके जबान पर नहीं हैं। यह उपलब्धि उन्होंने अपनी कर्मठता, संघर्ष और परिश्रम से प्राप्त किया है। आज अगर उनके लिए सबसे सफल और सबसे प्रिय गायक का विशेषण लगाया जाता है, तो यह सब ना ही केवल नियति की कृपा है, ना ही किसी गाॅड फादर की दया और ना ही ‘पेड पब्लिसिटी’ का करिश्मा। यह वास्तविकता की धरती पर प्रतिभा की संपन्नता के साथ-साथ परिश्रम की उर्वरा से तैयार किया गया फसल है। उनको केवल मिडिया ही मेगा स्टार या लोकप्रिय अभिनेता, गायक नहीं मानती, वे सबसे अधिक सुपर हिट फिल्में देने वाले भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता हैं। वे सबसे अधिक शो करने वाले गायक हैं तथा सामाजिक कार्यों में भी सबसे व्यस्त रहने वाले कलाकार हैं। यह भी सत्य है कि उनके कार्यक्रमों में श्रोताओं की सबसे अधिक संख्या पहुँचती है। श्रोता उन्हें सुनते है और सम्मान भी देते हैं। वे जब फिल्म के सुनहले पर्दे पर आते हैं तो दर्शक का दिल बाग-बाग हो जाता है। हाॅल के तालियों की गड़गड़ाहट से ‘काॅस्टिंग-म्यूजि़क’ म्यूट हो जाता है। जब मंच से किसी शो का आग़ाज करते हैं तो श्रोताओं तथा दर्शकों पर एक अलग ही दीवानापन छा जाता है। तब यह सब देखकर साफ हो जाता है कि अपनी कला के ही दम पर मनोज ने सबको अपना दीवाना बना लिया है। वे इस स्थिति से निराश जरूर हैं कि भोजपुरी फिल्में अपनों के बीच भी उपेक्षित बन गई हैं, परन्तु वे हार नहीं मानने वाले जीव लगते हैं। उन्हें इस बात का दुख है कि भोजपुरी फिल्मों में भोजपुरिया समाज नजर नहीं आता है। आज की फिल्में समाज का दर्पण के बजाय कमाने का धंधा बनकर रह गई हैं। उनकी माने तो अच्छी सोच के निर्माता, निर्देशक, कहानीकार और संगीतकार भोजपुरी फिल्मों का जीर्णोद्धार कर सकते हैं। हमारी संस्कृति और महिलाओं को गलत ढंग से न प्रस्तुत किया जा सके, इसके लिए वे अलग सेंसर बोर्ड के हिमायती हैं। मनोज तिवारी को भोजपुरी गायन को सर्वप्रिय बनाने के साथ ही उन्हें भोजपुरी सिनेमा को पुनर्जीवित करने श्रेय जाता है। वे समृद्धि की बात करते हैं, भोजपुरी की चिंता करते हैं और सिनेमा के स्तर को सुधारने के प्रयास की बात करते हैं। वे बचपन में खो कर चंचल बच्चे की तरह मुखर हो जाते हैं, संघर्ष के दिनों को याद करके सफलता के दर्प में चमक जाते हैं तो भावनात्मक प्रश्नों के उत्तर देने से पहले सजल आँखों से उन भावात्मक लम्हों और अवसरों के प्रति नत नजर आते हैं।
     मनोज तिवारी ‘मृदुल’ आज भले ही लोकप्रियता, सफलता और एक आकर्षक व्यक्तित्व का नाम हो, परन्तु इन सबके पीछे है, उनका अथक परिश्रम, उनके अग्रज का स्नेह-सहयोग, उनके पिता का प्रथम सुर का संस्कार तथा माता का आशीर्वाद। मनोज तिवारी का स्वभाव उनके उपनाम की तरह ही ‘मृदुल’ है। उनके किसी भी भाव में कभी घमंड नहीं दिखा। वे अपने सहयोगी प्रवृत्ति के लिए आदरणीय माने जाते हैं।  कई बार उनके विषय में नकारात्मकता भरे समाचारों को उछाला गया, परन्तु वे तब भी अथक परिश्रम में लगे रहते हैं। अपने गीतों से लोकप्रियता की चोटी पर विराजमान मनोज तिवारी ने गायन और अभिनय, दोनों से सबको दीवाना बनाया है। वे निरंतर परिश्रम के बल पर अपनी प्रतिभा को निखारने तथा प्रस्तुत करने में लगे रहने वाले शख्सियत हैं।
मनोज तिवारी ‘मृदुल’ के प्रशंसकों का यह मानना है कि वे पहले लोक के गायक थे, आज लोकप्रिय गायक हो चुके हैं। उन्होंने कलाकारों में न कभी गुटबाजी को पसंद किया और ऐसे लोगों को न कभी कलाकार मानते हैं। उन्हें गंदी राजनीति से सर्वदा एलर्जी है तो वे भारतीय राजनीति के विषय में निरंतर चिंतन करते रहते हैं। उनका विरोध करने वाले भले कुछ भी कहें, परन्तु यह बात तो सभी जानते हैं कि लोकप्रियता ईष्र्या और प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है। आज भी मनोज तिवारी के गायकी का रंग सबसे चटक है। आज भी वे भोजपुरी सिनेमा में अभिनय के बाजीगर बने हैं और आज भी वे एक अपराजित योद्धा की तरह जीवन के सभी रंगों में रंगते नजर आते हैं। पिछले दिनों भोजपुरी के उसी लोकप्रिय सुपर स्टार मनोज तिवारी ‘मृदुल’ से भोजपुरी पंचायत की ओर से मैं उनके दिल्ली आवास पर मिला। उस दौरान मिस्टर मृदुल की ओर से बहुत ही सकारात्मक और सहयोगात्मक व्यवहार अपनाया गया। उन्होंने लगभग चार घंटे का अपना बहुमूल्य समय देकर हमारे हर प्रश्नों का सहज उत्तर देते हुए अपने जीवन के अनेक अनछूए पहलुओं से हमें अवगत कराया। प्रस्तुत है उनके जीवन के कुछ छूए तो कुछ अनछुए लम्हेः -

प्रश्न - कहा जाता है कि ‘होनहार बिरवान के होत चिकने पात’ तो आपको सबसे पहले यह कब आभास हुआ कि आप एक बहुत ही अच्छा गायक हो सकते हैं?
उत्तर - (पहले बड़ी कोमलता से मुस्कुराते हैं, फिर कुछ पल के लिए कहीं खो जाते हैं) आपने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया। बहुत ही रोचक प्रश्प किए आप। (मुस्कुराते हैं) मैं डालमिया नगर के आर. एन. सिंह नर्सरी स्कूल, रजवरवा बिघा में पढ़ता था। वहाँ शनिवार का दिन मनोज तिवारी का रहता था। जो छात्र कभी नहीं आता था, वह शनिवार  को मेरे गीतों को सुनने के लिए आता था। मुझे याद है कि हेडमास्टर साहब मेरे गीत को सुनकर बहुत प्यार देते थे। तब कभी-कभी मुझे लगता था कि हो न हो मैं कहीं गायक ना हो जाऊँ।
प्रश्न - उस समय आप विद्यालय में कौन-सा गीत गाते थे? 
उत्तर -मैं हल्दीघाटी का चेतक प्रसंग गाता था। लक्ष्मण शक्ति गाता था। (गुनगुनाते हैं) - मुँह को मोड़ी चले, हमको छोड़ी चले, हाय हाय रे लक्ष्मण भैया।’ शनिवार के गानों पर लोगों की जो प्रतिक्रिया होती थी, उससे मेरा उत्साह बढ़ता था। 
प्रश्न - क्या आपको अपनी पहली संगीत शिक्षा का कोई दृश्य याद है? क्या हमारे पाठकों को बताना चाहेंगे? 
उत्तर -जी, अवश्य। मेरे पिता जी श्री चंद्रदेव तिवारी जी शास्त्रीय संगीत के गायक थे। वे 1983 में हम लोगों को छोड़ गए थे, तब मैं दस साल का था। उन्होंने मुझे एक सरस्वती वंदना सिखाया है। या कुंदेंदुतुषार हार धवला . . . (मगन होकर सुर लगाते हैं और भावुक हो जाते हैं।) मुझे मेरे पिताजी ने इतना ही सिखाया और पता नहीं कंप्यूटर का कौन सा चीप दिमाग में पड़ गया कि मैं कभी नहीं भूलता हूँ। जब गाता हूँ, तो वैसे ही गाता हूँ। सुर भी वहीं है। जबकि बाकी शास्त्रीय संगीत की साधना मैंने उतनी नहीं की। 
प्रश्न - तो क्या यह कहा जाय कि शनिवार के कार्यक्रम और आपके पिता जी की शिक्षा ने ही आज इस मुकाम पर स्थापित किया है?  
उत्तर -जी हाँ। बहुत हद तक यह भी कहा जा सकता है। मुझे भी लगा कि पिता जी का सीखाना और शनिवार के कार्यक्रम गायक मनोज तिवारी को तैयार कर रहे थे लेकिन मैं प्रयास नहीं करता था। प्रयास तो मेरा असफलता के बाद शुरू हुआ। 
प्रश्न - आप किस तरह की असफलता की बात कर रहे हैं? 
उत्तर -जब मैं 1992 में ग्रेजुएट हुआ, नौकरी नहीं लगती थी। हम लोगों ने आरक्षण का दौर झेला है। मंडल-कमंडल सुरसा की तरह मुँह बाए खड़ा था, तो मरता क्या न करता। हम अवसर खोज रहे थे, क्योंकि हमलोग जैक आॅफ आॅल मास्टर आॅफ नन थे। सब कुछ थोड़ा-थोड़ा जानते थे, मास्टरी किसी में नहीं थी। इसके बीच ही मेरी सफलता में इंदिरा जी की हत्या का बहुत बड़ा योगदान है। मुझे अच्छी तरह याद है 31 अक्टूबर 1984। मैं रेडियो पर सुना था कि इंदिरा जी को मार दिया गया। मुझे लगता है कि मैं ही क्या, उस समय तो देश का हर व्यक्ति रोया होगा।  उनकी हत्या के बाद जीवन में पहली बार मैंने रचना की। रेडियो से सुनकर तथा अखबार में पढ़कर जो पता चला, मैंने उसपर एक गीत बनाया था। -
‘निकली अपने घरवा से भारत के महरनीया,
इंदिरा गांधी महान, एही देशवा के शान
चली दफ्तर को ऽऽऽ।
बोली बेटा क्या कर रहे हो, हाथ लिए हथियार हो,
एतना ही कह वह भारत ज्योति ज्योंहि किया उन्हें पार हो।
दन-दन गोलिया बदन चीर दिहले।।
(गीत गाते-गाते भावुक हो जाते हैं। आँखें भर जाती हैं, गला रूद्ध जाता है। कुछ पल रूकते हैं। उसी दौरान मीठे फलों का प्लेट आता है। कुछ क्षण का अंतराल, फिर साक्षात्कार प्रारंभ।) 
प्रश्न - आपके उस गीत का आपके जीवन में क्या महत्त्व रहा?
उत्तर -उसके बाद जितना शादी-विवाह, जनवासा, जनेउ होता था, मैं इस गाना को गाकर हीरो हो जाता था। जब मेरे महीने का खर्चा चार सौ रूपया होता था, इस गाना को गाकर मुझे दो-ढाई हजार रूपया ईनाम मिल जाता था। उस गाने ने मुझे विश्वास दिलाया कि मनोज तुम लिख सकते हो। तुम्हारे लिखने पर लोग रो सकते हैं। किसी-किसी मुद्दे पर हँस भी सकते हैं। मेरे लिए वह घटना बहुत बड़ी थी। आज भी जब मैं गाता हूँ तो पूरा दृश्य याद आ जाता है। उस घटना ने कवि मनोज और गायक मनोज को विश्वास दिलाया कि कुछ न हो तो इसकी कोशिश करना।
प्रश्न - क्या आप अपने संर्घष के दिनों को अपने प्रशंसकों से शेयर करना चाहेंगे? 
उत्तर - मैं 1992 से नौकरी खोज रहा था। मैंने बीपी.एड., एमपी.एड. किया। बी.एच.यू. से टीचर की पढ़ाई पढ़ी। फिर भी नौकरी नहीं मिली। मैंने दरोगा की परीक्षा दी। दानापुर कैंट में फौज के लिए दौड़ा हूँ। उसमें भी नहीं सफलता मिली। वैसे 1996 मेरे लिए एक टर्निंग प्वाइंट था। उस वर्ष में यूपी-बिहार दोनों जगह से दरोगा की परीक्षा पास कर गया। उसी साल बी.एच.यू. क्रिकेट टीम का कैप्टन रहने के कारण स्पोस्र्ट कोटे में ओएनजीसी में मेरी नौकरी लग गई। और जो मैं 1992 से गाने की कोशिश कर रहा था, 1996 में ही टी-सीरीज से मेरा पहला अलबम आया। उसी साल मेरी मुलाकात रानी से हुई।
प्रश्न - क्या टी-सीरीज की यात्रा औचक ही थी? या उसके लिए भी संघर्ष करना पड़ा? फिर सफलता कैसे मिली?
उत्तर - टी-सीरीज चार साल गया हूँ सर, चार साल। आज लोग चार महिना जाने को तैयार नहीं हैं। उस चार साल में टी-सीरीज के अधिकारी मुझे देखकर छुप जाते थे। एक बार मुझे अपने मित्र के परिवार के साथ वैष्णो देवी जाना पड़ा। उसके बीस दिन पहले का कलकत्ता में रिकार्ड किया गया एक माता का अलबम था मेरे पास। वह कैसेट मेरे बैग में था, जो सबसे पहले वैष्णो देवी गया। जब मैं वहाँ से लौटकर दिल्ली आया, तो टी-सीरीज चला गया। वहाँ तो आना-जाना लगा ही था। उस दिन अधिकारी मिल गए। मैं बोला कि भैया एक नया अलबम लाया हूँ। थोड़ा सुन लीजिए। जैसे ही हम अंदर जा रहे थे कि सामने ही गुलशन कुमार जी मिल गए। मैं उनका पैर छूकर प्रणाम किया। पता नहीं उनके मन में क्या आया कि बोले ‘बेटा कहाँ से आए हो?’ मेरे बोलने से पहले ही वे अधिकारी बोले कि मनोज नाम है। बीएचयू में पढ़ता है और गाना गाने के लिए आते रहता है। तो मैं बोल दिया कि सर एक कैसेट लाया हूँ सुनाने के लिए। बोले - लगाओ-लगाओ। (मनोज तिवारी प्रसन्नता में भींग कर जैसे भाव-विभोर हो जाते हैं।)
    यह सब अकस्मात हो रहा था। बगल में एक कमरा था, वहाँ कैसेट लगा दिया गया। उस कमरे में तब के गायक भरत शर्मा व्यास, मुन्ना सिंह, सतेंद्र पाण्डेय आदि अनेक लोग बैठे थे और गुलशन जी खड़े होकर सुन रहे थे। कैसेट का पहला गाना था, निमिया के डाढ़ मैया . . । पूरा गाना नौ मिनट पच्चीस सेकेंड का है। पता नहीं उसमें क्या था कि सुनते समय न गुलशन जी हिले न दीप मुहम्मदाबादी और न बाकी सुनने वाले। जब गाना खत्म हुआ तब जैसे सबको होश आया। मैं भी वहाँ के माहौल से अचंभित था। मैं सबका चेहरा देख रहा था। जैसे ही गाना बंद हुआ, गुलशन जी ने कहा - अरे, यह तो बहुत अच्छा है। . . . इस प्रकार के संघर्षों के बाद सात मार्च 1996 को मेरा कैसेट ‘मइया के महिमा’ निकला। उसके बाद से तो मेरी दुनिया ही बदल गई।
प्रश्न - सफलता-असफलता के बीच संर्घष करते हुए मनोज तिवारी के नाम के आगे आज जब सुपर स्टार लगता है तो कैसा अनुभव होता है?
उत्तर - सुपर स्टार जब शुरू में लगता था तो अच्छा लगता था, लेकिन आज तो आम हो गया है। सुपर स्टार कोई भी लगा लेता है। इसलिए बहुत रोमांचित नहीं करता है। सच बताऊँ तो मैं सुपर स्टार बनने के लिए काम ही नहीं करता। मैं सुपर भोजपुरीया स्टार बनने के लिए काम करता हूँ। मेरी कोशिश है कि जो हो, समृद्ध हो। मेरे बाद भी जो लोग उस रास्ते पर चलें, उनको फायदा हो। अगर मैंने पचास लाख लेकर काम किया है तो आने वाली पीढ़ी को भी पचास, साठ, अस्सी लाख मिले। जीवन में मेरी सिर्फ यहीं कोशिश है और मैं उसमें सफल हूँ। मैं जिन-जिन रास्तों पर गया हूँ, अपने पिछे आने वाले भाइयों-बहनों के लिए करोड़पति बनने का रास्ता खोल दिया हूँ।
प्रश्न - क्या कारण है कि आज कल भोजपुरी फिल्म में स्टार कोई है ही नहीं, सभी सुपर स्टार हैं?
उत्तर - उसे हम लोगों को निगेटिव नहीं लेना चाहिए। देखिए, हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि मेरे साथ सुपर स्टार लगे। अगर कोई व्यक्ति सिनेमा का हीरो बन सकता है तो वह अपने से तो सुपर स्टार लिख ही सकता है। निर्भर करता है कि पत्रकार भी लिखते हैं क्या? आप लिखेंगे कि नहीं, यह महत्त्वपूर्ण है। यह तो हमारी मिडिया को चुनौती है कि आप पहचानिए - कौन सुपर स्टार है, कौन मेगा स्टार है, कौन महानायक है? भोजपुरी क्षेत्र में इन शब्दों का प्रयोग मिडिया के द्वारा सोच-समझ कर होना चाहिए। 
प्रश्न - इतना ही नहीं, सभी भोजपुरी फिल्मों के साथ सुपर हिट लिख दिया जाता है। कोई फिल्म फ्लाॅप ही नहीं होती। इस पर आप क्या कहेंगे?
उत्तर - यह भोजपुरी से जुड़ी मिडिया के लिए बहुत बड़ा प्रश्न है कि आप पी. आर ओ. के समाचार को अपना काॅलम क्यों बनाते हैं? पी.आर.ओ. तो पैसा लिया है, वह बोलेगा ही। अब यह तो आपलोगों की जिम्मेदारी है कि अपने अखबार, अपनी पत्रिका में किसके लिए कौन-सा शब्द प्रयोग किया गया है। इसमें कलाकार का दोष नहीं है। अपनी फिल्म के लिए तो वह सुपर हिट लिखवाएगा ही, उसकी सच्चाई का पर्दाफाश आप लोग करें। ( हँसते हैं)
प्रश्न - गायकी से सीधे फिल्मों में आना, उस बदलाव को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर - जब 2003 में सुधाकर पाण्डेय जी तथा राइटर-डायरेक्टर राजेश सिन्हा जी की फिल्म ‘ससुरा बड़ा पइसा वाला’ का आॅफर आया तो उसके रेट को सुनकर मैं तैयार ही नहीं हुआ। मुझे फिल्म नहीं करनी थी, क्योंकि उस समय एक दिन के लिए मैं एक लाख रूपया लेता था। उन लोगों ने कहा कि पंद्रह दिन लगेगा। मैं बोला कि तब कम से कम पंद्रह लाख रूपया चाहिए। वे लोग तीन-चार माह तक लगे रहे, फिर मैंने फिल्म की। स्क्रीप्ट पढ़ा तो मन बन गया। कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी।  उसके बात तो मेरी क्या, उससे जुड़े सबकी किस्मत खुल गई। वैसे बाद में पाण्डेय जी ने मुझे बहुत उपहार भी दिया। वह फिल्म 11 शहर में 50 सप्ताह तक उतरी ही नहीं। उसकी लागत 29 लाख थी जिसने 34 करोड़ की कमाई की। बहरहाल, उससे भोजपुरी फिल्मों का एक नया दौर प्रारंभ हुआ। 
प्रश्न - आप कैसे कह सकते हैं कि सबकी किस्मत खुल गई?
उत्तर - अगर केवल अपनी ही बात बताऊँ तो आप समझ जाएँगे। मैं दूसरी फिल्म दरोगा बाबू आई के लिए पच्चीस लाख लिया, बाद में तो 80-80 लाख रूपया लेकर काम किया हूँ। हालाँकि उसी दौर में मुझसे गलती भी हुईं। जब मैं 80 लाख रूपया लेता था तो पूरे फिल्म का बजट ही सवा करोड़ होता था। तब लोग फिल्म नहीं बना रहे थे, केवल मनोज तिवारी का नाम छाप कर पैसा कमा रहे थे। उसका नुकसान तो हुआ है, फिल्मों के व्यवसाय पर असर पड़ा। 


प्रश्न - सन् 1963 में विश्वनाथ प्रसाद शाहबादी निर्मित पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ का प्रदर्शन हुआ था। उसके गाने आज भी कर्णप्रिय और लोकप्रिय हैं। उन्हें कहीं भी, किसी के साथ भी सुना जा सकता है। क्या कारण है कि आज उस तरह के यादगार गाने नहीं बन रहे हैं? 
उत्तर - 'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ के गाने बहुत कर्णप्रिय थे, उस समय रफी साहब गाए हैं, लता दीदी गायीं हैं। आज क्या बड़े लोग भोजपुरी में गाना या एक्टिंग करना चाहते हैं? इसीलिए तो भोजपुरी फिल्मों का कलाकार होते हुए भी पिछले दो वर्षों में मेरी निराशा हुई है। निराशा इसलिए भी कि लोगों ने मेरे ऊपर ही अटैक किया।
प्रश्न - आप अक्सर समृद्धि की बात करते हैं। क्या हमारे पाठकों को अपनी समृद्धि के विषय में बताना चाहेंगे?
उत्तर - मेरी कोशिश हमेशा यह रहती है कि समृद्धि देखूँ। समृद्धि केवल मैं नहीं देखूँ, जिस रास्ते पर चलूँ, उस पर समृद्धि बरसती रहे। मैं यह नहीं चाहता कि केवल अपने लिए ही बहुत सारा सोहरत बटोर लूँ और बाकी के लिए रास्ता बंद कर दूँ। छत पर चढ़कर पैर मारकर सीढ़ी नहीं उतारना चाहता कि दूसरा कोई न चढ़ पाए। मैं जब पहली बार 1996 में टी-सीरीज में गाना गाने गया तो उस समय के सुपर स्टार भरत शर्मा, मुन्ना सिंह, शारदा सिंहा और बालेश्वर यादव जी थे। मेरे पहले अलबम के लिए बारह हजार मिला और पता चला कि यही सबका रेट है। दूसरे अलबम के लिए मुझे 25000 मिला। उसके बाद जैसे जैसे मेरा रेट बढ़ता गया, वैसे वैसे अन्य लोगों का भी रेट बढ़ता गया था। यह इसलिए बता रहा हूँ कि मैं प्रारंभ से यही सोचता था कि मेरा पेमेंट बढ़ेगा तो सबका बढ़ेगा। बाद में मैं विडियो का भी पैसा लेना प्रारंभ किया और उसके बाद लोगों को भी मिलने लगा। आज की तारीख से तुलना करें तो हम लोग 2006 में एक अलबम का छह लाख लेते थे, जबकि आज पूरी फिल्म में गाने के लिए दो लाख भी नहीं मिलता है। अब यह आपके शोध का विषय है कि हम कहाँ हैं? (कुछ पल शांत रहते हैं। सबके लिए चाय आता है, वे स्वयं सबको प्यालियाँ आॅफर करते हैं। एक छोटी चुस्की, फिर बोलना प्रारंभ।)
इतिहास गवाह है कि मेरे बाद आने वाले सभी हिट हीरो, भले क्वालीटी जो भी देता हो, वह भी 40 लाख के क्लब में शामिल हो गया हैं। जिनको चार हजार की नौकरी मिलनी मुश्किल थी, वह चालीस लाख की कमाई करने लगा है। रवि भाई (अभिनेता रवि किशन) तो कल भी फिल्म करते थे, आज भी करते हैं, कल भी करेंगे, परन्तु जब वे भी अकेले बैठकर सोचते होंगे तो याद आता होगा कि अगर उन्हें भी पच्चीस लाख मिला तो उसके पिछे मनोज तिवारी की सोच क्या थी? जहाँ हम लोग स्टेज पर पाँच हजार में गाना गाते थे, वहाँ आज 10 लाख में भी गाना गाते हैं। आज के समय में पूरे देश में जहाँ कोई बड़ा कार्यक्रम हो रहा होगा वहा जरूर बुलाया जाता हूँ। बाकी लोगों की बात तो नहीं जानता, पर मैं अपने रास्ते पर चल कर आने वालों के लिए रास्ता बनाता रहता हूँ। समृद्धि पर यही मेरा सिद्धांत है।
प्रश्न - आप अभी कुछ निराशा और अटैक की बात कर रहे थे। क्या इन पहेलियों को कुछ स्पष्ट करेंगे?
उत्तर - मेरी निराशा यह है कि जब इस दौर में हम भोजपुरी के लिए ऐसे काम कर रहे हैं तो कुछ लोगों ने हमें अपमानित करने के लिए भी काम किया है। जैसे भोजपुरी फिल्म अवार्ड्स शुरू किया गया। वह सिर्फ मुझे अपमानित करने के लिए किया गया। आप या कोई पता कर ले लिए मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है या बिगाड़ने की क्या नियत रखा है? मैं तो ऐसे आजोजन की सराहना करते हूँ, लेकिन निर्णय पर प्रश्न-चिह्न है। हो सकता है कि कभी कुछ लोग अपने साथ बैठाना चाहें होंगे, लेकिन मैं समय नहीं दे पाया होऊँगा। वैसे मेरी नियत कभी गलत नहीं रही है। मैं हमेशा भोजपुरी को समृद्ध करना ही चाहता रहा। इस चार साल के अंतराल में भोजपुरी फिल्म फिर से रसातल में चली गई। अब आप स्वयं से ही प्रश्न कीजिए कि आपने क्या दिया भोजपुरी को? 
(कुछ पल गंभीर हो जाते हैं, जैसे हृदय को कभी घातक आघात पहुँचा हो, फिर चाय का मग नीचे रखते हुए वार्ता शुरू करते हैं।)
   मैं आपसे बेबाक बात कर रहा हूँ। मैं तो चाहता भी नहीं हूँ कि अभिनेता के रूप में जाना जाऊँ। मैं गायक हूँ, गायक ही रहना चाहता हूँ। लेकिन अब ईश्वर ने दे दिया और रिकार्ड के आधार पर आपको तो मानना ही पड़ेगा न कि मनोज तिवारी एक्टर भी है। मगर मुझ पर जो अटैक किया गया, उससे पूरी इंडस्ट्री को नुकसान हुआ। हमें तो एक-दूसरे की सराहना करनी चाहिए। इसके बाद भी मुझे ताकत मिलती रहती है कि देश की कई संस्थाएँ, कई लोग और मिडिया भी बहुत प्यार देती है। आज भी मैं यही चाहता हूँ कि लोगों को एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए। अगर मकान के नीव को गिराओंगे तो कहाँ का रह जाओगे? मकान के नीव को इज्जत दो, मकान वैसे ही चमकता रहेगा। 
प्रश्न - आपके व्यक्तित्व में एक कवि भी छिपा रहता है। साहित्य के प्रति आपकी कैसी रूचि रही है? 
उत्तर - मैं तो साहित्कारों के सानिध्य में भी पला बढ़ा हूँ। कलकता का भारतीय भाषा परिषद, विष्णु कांत शास्त्री, नरेश मेहता, बुद्धिनाथ मिश्र, कृष्ण बिहारी मिश्र, भोलानाथ गहमरी जी, हरिराम द्विवेदी, चंद्रशेखर मिश्र आदि लोगों के सानिध्य में मैंने होश संभाला है। मैं बनारस में लोक रस अवार्ड भी शुरू किया था। मैं आज भी साहित्कारों को दिल से प्रणाम करता हूँ और उनका स्नेह पाने की इच्छा रखता हूँ। मेरे लिए साहित्य व्यक्ति और समाज का आइना है। जैसे आपकी पुस्तक ‘कठकरेज’। मुझे ‘कठकरेज’ शब्द के चयन से ही पता चल जाता है कि यह आदमी कैसा होगा। आज की व्यस्तता में मैं साहित्यिक कार्यक्रमों में नहीं जाता हूँ लेकिन साहित्कारों के प्रति आदर है। 
प्रश्न - आपने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि आज तक आपको एक भी फिल्म का स्क्रिप्ट नहीं मिला।  पूछने पर लेखक-निर्देशक कह देते हैं कि भैया, अपनी ओर से कुछ भी बोल दीजिएगा। क्या आपको नहीं लगता कि अगर स्क्रीप्ट होता तो अपनी फिल्मों का कुछ और ही रूप होता?
उत्तर - अरे सर, यह समस्या आज भी है। बिना स्क्रीप्ट की फिल्में हो रही हैं। यह तो सचमुच बहुत ही दुखद है।
प्रश्न - भोजपुरी भाषा के साथ भोजपुरी सिनेमा के लिए आप हमेशा चिंतित नजर आते हैं। तो अपनी ओर से आप क्या प्रयास कर रहे हैं?
उत्तर - अब तक तो प्रयास करता था कि लोग स्टडी करके अच्छी कहानी लिखें और जो हम दिखा रहे हैं तो वैसा भोजपुरी संस्कृति में होता भी है कि नहीं, इसका ध्यान रखा जाए। मुझे अब तक निराशा मिली पर अब 2014 में मैं अभिनेता के साथ-साथ निर्माता के रूप में भी आ रहा हूँ। अब मैं फिल्म बनाऊँगा भी और अभिनय भी करूँगा। मैंने एक प्रोडक्शन कंपनी भी बना लिया है जिसका नाम ‘लिट्टी-चोखा इंटरनेशनल’ है। 2014 के अगस्त में पहली फिल्म लेकर आ जाऊँगा। उन समस्याओं का सारा निदान यही हैं कि दूसरों से कहने के बजाय स्वयं ही करें। पिछले दो साल में मैं मुश्किल से तीन या चार फिल्म किया हूँ। वह मेरे चिंता एवं निराशा के कारण हुआ। मन नहीं करता था, क्योंकि एक गायक के रूप में मैं अपने आप के अब तक के सबसे ऊँचे स्तर पर पा रहा हूँ। पूरी दुनिया से गाने के लिए बुलावा आता है। मैं अपने कलाकारों से यही कहूँगा कि बड़े होने का दंभ मत पालो, मेहनत से बड़ा बनकर सिद्ध करो।
प्रश्न - भोजपुरी के गीतों पर अश्लीलता का आरोप लगा रहता है। इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर - ऐसा नहीं है कि भोजपुरी में केवल खराब गाने ही बनते हैं। अभी हम लोगों ने ‘इंसाफ’ फिल्म किया था, जिसका एक गाना था, - 
‘अरे, बाबुजी के नेह के कैसे भुलाईं,
नाहीं बानी बाकीर हमरा बहुते याद आईं।’
   आज भी भोजपुरी में बहुत अच्छे-अच्छे गाने बनते हैं, लेकिन कुछ लोग फूहड़ गानों को ही फोकस करते हैं। इसके शत्रु तो यह कहते हैं कि भोजपुरी में अश्लील चीजें पसंद की जाती हैं। मैं उनसे पूछना चाहूँगा कि तो भैया चालीस करोड़ का व्यवसाय पचास लाख पर कैसे आ गया? 
प्रश्न - साहित्य, कला, संस्कृति, सब कुछ प्राचीन समय से ही समृद्ध होने के बाद भी भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा नहीं मिला, इसके लिए आप किसे दोषी मानेंगे?
उत्तर - हमारे जन प्रतिनिधियों को। भोजपुरी क्षेत्र के जो प्रतिनिधि हमारे संसद में बैठे हैं, वे ही इसके लिए पूर्ण दोषी हैं। उन्होंने अपने और अपनी पार्टी के भलाई के अतिरिक्त भोजपुरी के लिए कुछ भी नहीं भला सोचा। आप देखते ही है कि तमाम सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाएँ कार्यक्रम कराती रहती हैं, वहीं नेता आकर भाषण में आश्वासन देते हैं, परन्तु कुछ होता नहीं है। हमारे जन प्रतिनिधि जिस दिन सोच लें, एक माह में हो जाएगा।
प्रश्न - आपके विचार से इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर - सभी लोग एकजुट होकर दृढ़ इच्छाशक्ति से एकता दिखाएँ तो एक माह में भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा मिल जाएगा। हमारे राजनेताओं को भी हमारी बात माननी पड़ेगी।
प्रश्न - आप भी चुनाव लड़ चुके हैं। आज के राजनैतिक माहौल में आप स्वयं को कहाँ पाते हैं?
उत्तर - विगत कुछ दिनों से मुझे कुछ ऐसा लगता है कि आज के राजनैतिक माहौल में मैं फिट नहीं बैठता हूँ। मैं भले ही किसी पार्टी में रहूँ, लेकिन राष्ट्रीय आपदा आने पर पार्टी के नीतियों के विरूद्ध भी मेरा वक्तव्य हो सकता है। आज के भारतीय राजनीति में यह स्वतंत्रता छीन गई है। आप बहुत विचारवान व्यक्ति हैं, लेकिन आपकी द्वारा अगर गलत रास्ता पकड़ लिया गया, तुष्टीकरण की नीति अपना ली गई, तो आपको भी साथ रहना है। इस स्थिति में लगता है कि मुझे निकाल दिया जाएगा।
प्रश्न - तो क्या अब यह माना जाय कि आप आगे चुनाव नहीं लड़ेंगे? 
उत्तर - भारतीय राजनीति में अपने विचार की स्वतंत्रता भले ही छीन गई है लेकिन फिर भी यह नहीं कह रहा हूँ कि मैं चुनाव नहीं लड़ सकता। बहुत दृढ़ इच्छा-शक्ति नहीं है, लेकिन अगर परिस्थितियाँ बनीं तो मैं कायर की तरह पीठ दिखाकर नहीं भागूँगा। 
प्रश्न - आप गायन, अभिनय के साथ-साथ राजनीति से भी जुड़े हैं। आपके गायन का दौर जब प्रारंभ हुआ तो भोजपुरी गीतों को एक नया स्वरूप मिला। आप जब फिल्मों में आए तो ऐसा कहा जाता है कि भोजपुरी फिल्मों का पुनर्जन्म हुआ, तो क्या हमारे पाठक यह माने कि अब आप भारतीय राजनीति को भी अपने विचारों से प्रभावित करेंगे?  
उत्तर - (पहले मुक्त केठ से हँसते हैं) मैं इतना ताकतवर तो नहीं हूँ कि भारतीय राजनीति प्रभावित हो जाए। यह लोहिया का देश है, जय प्रकाश नारायण का देश है, गांधी का देश है। यह राजीव गांधी के वैज्ञानिक सोच का देश है। अटल बिहारी वाजपेयी के संसाधनों के विकास और उपयोग का देश है। मेरे पास तो कोई ऐसा अद्भूत सिद्धान्त नहीं है कि मैं भारतीय राजनीति को प्रभावित करूँ। 
प्रश्न - आप तो चुनाव भी लड़ चुके हैं। तो फिर राजनीति के प्रति लगाव क्यों? 
उत्तर - चुनाव लड़ने के पिछे मेरा नजरिया यही है कि मैं लोगों को संदेश देना चाहता हूँ कि राजनीति को अछूत मत समझो। अगर कलाकार, पत्रकार, साहित्यकार जैसे अच्छे सोच के लोग ही अछूत समझने लगेंगे तो राजनीति में रहेगा कौन? इस प्रकार तो हम बूरे लोगों को खुलेआम मौका दे रहे हैं न। जब वहीं लोग राष्ट्रीय निर्माण की नीति बनाएँगे तो स्वयं ही सोच लिजिए कि देश का क्या होगा।
प्रश्न - अगले चुनाव में आप कहाँ से दिल्ली पहुँचना चाहेंगे? 
उत्तर - (पहले मुस्कुराते हैं, टालने का प्रयास करते हैं, फिर हँसते हुए कहते है) देखिए, बक्सर और द्वारका (दिल्ली), दोनों में मेरा घर है। यहाँ से चुनाव लड़ने पर कम से कम मैं बाहरी तो नहीं कहलाऊँगा।़
प्रश्न - आपके फिल्मी जीवन से आपका व्यक्तिगत जीवन भी बहुत अधिक प्रभावित रहा है। आपकी कमेस्ट्री अक्सर कई अभिनेत्रियों के साथ चर्चा में रहा है। बहुत हद तक इसी के कारण वर्तमान में तलाकशुदा भी हैं। आप इन बातों को कैसे लेते हैं? 
उत्तर - देखिए फिल्म के पर्दे पर मेरी कमेस्ट्री रानी चटर्जी और श्वेता तिवारी से बहुत अच्छी रही। अगर उसे अन्य अर्थ में न लिया जाय तो ये दोनों मेरे अच्छे दोस्त हैं। और जहाँ तक मेरे तलाक शुदा स्थिति की बात है, मैं अभी भी अपनी पत्नी को समझाने की कोशिश कर रहा हूँ। मुझे लगता ही नहीं है कि हमारा तलाक हो गया है। मेरे लिए मेरी पत्नी आज भी वही हैं। भले वह मुझसे अलग है लेकिन दुनिया क्या, भगवान भी नहीं अलग कर सकता। हमारी बेटी मेरा जीवन है। कष्ट है, मगर आशा है कि वह वापस आ जाए। 
प्रश्न - आपकी पसंदीदा फिल्में कौन-सी हैं?
उत्तर - 2003 के पहले मुझे राजकपूर साहब की फिल्में लुभाती रहीं और अमिताभ बच्चन साहब की फिल्मों का मैं दीवाना रहा हूँ। अब भोजपुरी फिल्मों में कहूँ तो ‘ससुरा बड़ा पइसा वाला’, ‘देहाती बाबू’, ‘बंधन टूटे ना’ और ‘कब अइबू अँगनवा हमार’ ये चार फिल्में मुझे बहुत पसंद हैं।
प्रश्न - आपकी आने वाली फिल्में और अलबम?
उत्तर - ‘सबकी दुलारी मोरी माई महरनीया’ मेरा नया अलबम आया है।  इस अलबम में मैंने गंगा के लिए बहुत ही कारूणिक गाना गाया है। ‘मेरी एक बूढ़ी माँ है, उसका उससे नाता है। मेरी माँ बताती है, गंगा मेरी माता है।’ नए साल पर मेरा बाल-गीतों का कैसेट ‘ओका-बोका’ रहा है। जहाँ तक फिल्मों की बात है, तत्काल में राजकुमार आर पाण्डेय जी की फिल्म ‘देवरा भइल दीवाना’ कर रहा हूँ। ‘परम वीर परशुराम’ पूरी होने की स्थिति में है। एक फिल्म ‘यादव पान भंडार’ अभी-अभी रिलीज हुई है। और इसके बाद ‘हमीद’।
प्रश्न - ‘भोजपुरी पंचायत’ के पाठकों से क्या कहना चाहेंगे? 
उत्तर - ‘भोजपुरी पंचायत’ के पाठक नियमित हों। वार्षिक सदस्य बनकर इसको मंगवाएँ। भोजपुरी समाज, भोजपुरी सिनेमा, भोजपुरी मनोरंजन, भोजपुरी साहित्य के लिए पत्रिकाओं की बड़ी कमी है, उसे पूरा करने में ‘भोजपुरी पंचायत’ का सहयोग करें। 
........................................
                                                                                                - केशव मोहन पाण्डेय  (सितंबर, 2013)

No comments:

Post a Comment