Nov 15, 2015

आतंक को धिक्कार


मुझमें जितनी असभ्यता है
उससे भी नीचे जाकर
मैं गाली देता हूँ
उन बर्बर कृत्यों को
जो आतंक से अभिहित हैं।
मुझमें जीतनी भी
जैसी भी
सच्चाई है
आज सच्चे मन ने
उन्हें बटोर कर
मैं श्राप देता हूँ
उन नास्तिक विचारों को
जो मानवता के शत्रु हैं।
मुझे जो संस्कार दिए हैं माँ ने
पिता ने जैसे सँवारा है
मैं वह सब कुछ
उड़ेल देना चाहता हूँ
उन असामाजिक तत्त्वों में
जो इसी समाज में रहते हैं।
वे रोटी नहीं खाते
पानी नहीं पीते
चैन से नहीं रहते
चैन से नहीं जीते,
बस जान खाते हैं
खून पीते हैं
आतंक फैलाते हैं
आतंक में जीते है
और नफ़रत करते हैं मानवता से
बम-बारूद से जिन्हें प्यार है
ऐसे आतंक के संवाहक जीवन को
धिक्कार है।
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- केशव मोहन पाण्डेय

Oct 13, 2015

अाग्रह

'प्रतिलिपि काव्य प्रतिस्पर्धा' में सम्मिलित मेरी कविता। कृपया पढ़ें और पसंद आए तो लाइक करें। आपके मार्गदर्शन की भी अपेक्षा है। 
http://www.pratilipi.com/read?id=6031657224110080

Aug 28, 2015

बढ़ते जाना है


हार मत मानना
रे मन!
कदम बढ़ाते जाना
आँखें
लक्ष्य पर अड़ाते जाना।

क्या हुआ जो गिर गए?
ऐसे ही तो
अनगिनत साधु, संत
और असंख्य पीर गए।

जो चलोगे नहीं
तो गिरोगे कहाँ
और जो चलोगे नहीं
सिर्फ डरोगे गिरने से
तो लक्ष्य समर्पण कैसे करेगा
स्वयं को
तुम्हारे चरणों में?

अगर सोचते हो
लक्ष्य को पाना है
तो हर हाल में
आगे
और आगे
और आगे
बढ़ते जाना है।
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© केशव मोहन पाण्डेय

Aug 23, 2015

माँझी : विद्रोह और जिद्द की महागाथा

    रिलीज के दूसरे ही दिन ‘माँझी: द माउण्टेन मैन’ फिल्म देखकर उठा तो मन कुछ लिखने को बेचैन हो गया। इस फिल्म पर लोगों की भरपूर प्रतिक्रियाएँ आयीं हैं। उन प्रतिक्रियाओं की कतार में मेरा कलम उठाना एक धृष्ठता ही है, क्योंकि मैं कोई फिल्म समीक्षक नहीं हूँ। पर हाँ, उस संसार से परिचित हूँ। उस विधा से जुड़ा हूँ और देने वाले ने कुछ समझने वाली नजर भी दी है। इन सबसे अलग और बड़ी बात है कि फिल्म देखकर मन आह्लादित है। मनःस्थिति में बहुत कुछ उथल-पुथल चल रहा है। उथल-पुथल कथानक के कारण भी है, वस्तु-स्थिति के कारण भी है और प्रस्तुति के कारण भी है। ‘माँझी: द माउण्टेन मैन’ की कथानक से मैं पूर्णतः 2007 में परिचित हो चुका था। दशरथ माँझी के देहावसान के बाद कई दिनों तक गाहे-बेगाहे समाचार पत्रों और टी.वी. चैनलों पर चर्चाएँ होती रही थीं। 
    आज फिल्म को देखकर मन कई बार आंचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ को याद करता रहा। कई बार उनकी सर्जना ‘पहलवान का ढोलक’ को याद करता रहा। ‘मैला आँचल’ को याद करता रहा। और याद आती रही उनकी ही लेखनी की कारीगरी का कमाल ‘तीसरी कसम’। मन यही नहीं रूका। कई कलमकारों को याद करता रहा। कई बार राही मासूम रज़ा और उनकी कृति ‘आधा गाँव’, ‘नीम का पेड़’ और ‘टोपी शुक्ला’ को मैं याद करता रहा। सच कहूँ तो ‘माँझी: द माउण्टेन मैन’ को देखकर ‘लगान’ फिल्म भी याद आयी। बस इसलिए कि ‘लगान’ में आंचलिकता को निभाया गया है और ‘माँझी: द माउण्टेन मैन’ में जीया गया है। मेरे विचार से जीना दिखावेपन के धरातल की सरपट दौड़ती सड़क नहीं, वास्तविकता की चट्टानों से लैस चुनौती देता पहाड़ है।
मेरे विचार से ‘माँझी: द माउण्टेन मैन’ एक भाव-प्रवण फिल्म है। इसमें अन्याय का विरोध है और लाठी के विरूद्ध दाँत से काटकर बधुआ न बनने की शक्ति है। शृंगार का सौंदर्य तो है ही, ‘निराला’ के ‘श्याम तन भर बधा यौवन’ का शब्द-शिल्प भी साकार दिखायी देता है। सामर्थ्यहीन दाम्पत्य जीवन का मान और रार-तकरार है तो प्रेम को पाने की पराकाष्ठा भी और ‘फगुनिया’ के पिता की चिंता हर गरीब पिता की चिंता भी है। समुदाय विशेष की रीतियों के साथ ही रूढ़ियों का पूर्णतः चित्रण फिल्म की सार्थकता को बढ़ाते हुए दर्शकों को उनकी जमीन से जोड़े रहता है।
    फिल्म अपने भाव-पक्ष को हर स्तर पर पूर्ण न्याय के साथ प्रस्तुत करने में सफल मानी जा रही है। आज के समाज में सामान्य-से-सामान्य परिवार में भी मातृत्व काल के सपनों को नर्सिंग हाउसों में ही पूरा करने की कल्पना की जा रही है उसके विपरीत साठ के दषक की गरीब ‘फगुनिया’ गृहस्ती में लीन है और तालाब से जल लेते समय बच्चे को जन्म देती है। रोटी के स्वाद के लिए पसीना का टपकाना ही सुखद-जीवन की बुनियाद है। फिल्म अपनी मस्त धारा में बहती चली जाती है और दर्शक एक-एक चित्रण को अपनी आँखों से पीता चला जाता है। 
    सच कहूँ तो मुझे ‘माँझी: द माउण्टेन मैन’ फिल्म एक जज़्बा की फिल्म लगती है। जज़्बा देश, काल का हो या परिस्थितियों से टकराने का। दशरथ माँझी का चरित्र किसी भी परिस्थिति से लड़ने का चरित्र है। वह अब्बर का समर्थक और जब्बर का विरोधी चरित्र है। चाहे गाँव के मुखिया के पास बधुआ बनने की बात हो या पहाड़ का सीना चीरने का प्रण। ‘मरद’ होने के प्रश्न पर कुल्हाड़ी के धौंस पर अपनी ब्याहता को जबरिया विदा करना का दम-खम हो या बाप के गाली-गलौज को मौन होकर सुनने की शक्ति। चाहे अकाल की परिस्थिति में भी काल से दो-दो हाथ करने की बात हो या पैदल ही दिल्ली की यात्रा पूर्ण करने का जिद्द।
    फिल्म की कहानी भले ही दशरथ माँझी की है मगर अभिनेताओं ने खूब जीया है। नवाजुद्दीन सिद्दिकी कहीं से भी अभिनेता नहीं लग रहे हैं। प्रारंभ से अंत तक लगता है कि साक्षात् दशरथ माँझी को ही देख रहे हैं। राधिका आप्टे भी अपनी भूमिका ईमानदारी से जी रही हैं, मगर नारी पात्रों में वास्तविकता के पास उनसे अधिक ‘लौकी’ लग रही है। फिल्म के पहले शॉट से अंत तक निर्देशक केतन मेहता की कलाकारी देखते बनती है। सिनेमेटोग्राफी भी उम्दा है। बस मुझे लगता है कि टूटते तारा को देखते समय पात्र कुछ अधिक अस्पष्ट हो गया है। वहाँ का रंग-संयोजन कुछ और संपादन लायक लगता है।
    साहित्य व सिनेमा का सीधा संबंध हृदय से होता है। इन दोनों माध्यमों में सिनेमा से कही गई बातों का असर तीब्र होता है। ‘माँझी: द माउण्टेन मैन’ फिल्म अपने कथानक द्वारा मानव-मन के आंतरिक भावों को व्यक्त करने में पूर्णतः सफल नज़र आती है। अगर देखा जाय तो मुख्य रूप से आंचलिक फिल्मों को मर्मस्पर्शी बनाने में सार्थक व सहज आंचलिक शब्द-प्रयोगों का बड़ा महत्त्व है। फिल्म में प्रयुक्त सहज बातों में भी गालियों का प्रयोग हो या एक-एक संवाद की प्रस्तुति, सारी चीजें फिल्म को ऊँचाई देने में अपनी भूमिका निभाती हैं। किसी छोटे उम्र या जाति वाले व्यक्ति के नाम के आगे ‘वा’ लगाना हो या ‘मेहरिया’ हो या ‘ड़’ का ‘र’ बोलना या वाक्यों के पहले और अंतिम शब्दों पर जोर देकर बोलना, फिल्म को देशज आवरण में सजाकर गया (बिहार) के दशरथ माँझी के गाँव में पहुँचा देता है।
    संवाद में भाषा के सहज प्रयोग से फिल्म का कथानक और भी स्पष्ट व प्रभावशाली हो गया है। किसी भी दृश्य-श्रव्य प्रस्तुति में भाषा का चयन संवाद को आकर्षक और पूर्ण बनाता है। निर्देशक केतन मेहता की कल्पना भाषा के सार्थक व सहज प्रयोग से पात्रों को साकार व जीवन्त कर बैठती है। पात्रों के हृदय की भावनाओं को भाषा के देशज प्रयोग ने सजीव कर दिया है।
    भाषा की शक्ति, कथानक का गुण, लयात्मक संवाद, सब मिलकर फिल्म को एक रोचक व मनोरंजक फिल्म बना रहे हैं। कुछ संवाद तो अनेक दर्शकों से जुबान से निकलने पर भी सुनता रहा। जैसे, ‘सब राजी-खुशी?’, ‘शानदार, जबरदस्त, जिन्दाबाद’, ‘जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं’ आदि। सहज, असरदार और बेजोड़ संवादों के साथ ही चित्रात्मक प्रस्तुत करने में भी यह फिल्म पूर्णतः सफल रही है। सीने में आग लिया दशरथ माँझी जब पहाड़ को चुनौनी देता है तो एक छोड़े से पत्थर से ही आग लगा देता है। अकाल के समय में जब माँझी जीवन से जुझने के लिए ताल ठोक लेता है तो पानी का स्रोत मिल जाता है। सबसे बड़ी बात कि माँझी जब जिद्द पर अड़ जाता है तो मुखिया, फगुनिया के पिता और पहाड़ से विद्रोह कर के वह आज का ‘दशरथ माँझी पथ’ का निर्माता बन जाता है।
    कुल मिलाकर ‘माँझी: द माउण्टेन मैन’ फिल्म सिनेमा के स्क्रीन पर दशरथ माँझी के प्रेम, विद्रोह और जिद्द की महागाथा बन कर दर्पण की तरह उभरी है। यह फिल्म दशरथ की कथा को पात्रों के अभिनय, संवाद, देश-काल और वातावरण के साथ प्रस्तुत करने में सफल रही है। वास्तविकता यह है कि फिल्म देखते समय मैं कई बार कलाकारों के अभिनय, संवाद अदायगी व फिल्म की प्रस्तुति की सराहना तो कर ही रहा था, साथ ही अपनी पत्नी से हमेशा कहता रहता हूँ कि माँझी के संघर्ष की इस महागाथा को आॅस्कर में जाना चाहिए। जरूर जाना चाहिए।
                                                           ...................................                                                                  
                                                                                  - केशव मोहन पाण्डेय

Jul 19, 2015

स्किल इंडिया की आवश्यकता क्यों?

    आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्किल डेवलपमेंट की ऊर्जा भर के असंख्य युवाओं की आँखों में सुखद सपने भर दिया है। पर बात केवल सपने दिखने से तो पूरी होगी नहीं। वास्तविकता तो यह है कि वर्त्तमान समय में स्किल डेवलपमेंट के मामले में दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले भारत काफी पीछे है। नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएसओ) के मुताबिक देशभर में सिर्फ 3.5 फीसदी युवा ही कौशल-संपन्न हैं। अगर यह तुलना कुछ अन्य देशों से किया जाय तो पता चलता है कि चीन में 45 फीसदी, अमेरिका में 56 फीसदी, जर्मनी में 74 फीसदी, जापान में 80 फीसदी और दक्षिण कोरिया में 96 फीसदी लोग स्किल ट्रेंड हैं। इसी दूरी को पाटने के लिए सरकार ने स्किल इंडिया मिशन की शुरुआत की है। इस मिशन को सफल बनाने में केंद्र सरकार के कई मंत्रालयों की भी अहम भूमिका होगी। जिसके माध्‍यम से स्किल डेवलपमेंट का कार्यक्रम चलाया जाएगा। जिसमें मुख्‍य रूप से रेल मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, प्रवासी भारतीय कार्य मंत्रालय, भारी उद्योग मंत्रालय, स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय, इस्‍पात मंत्रालय, विद्युत मंत्रालय और नवीन एवं नवीकरण ऊर्जा मंत्रालय तथा सामाजिक न्‍याय एवं अधिकारिता मंत्रालय शामिल हैं।
    दरअसल बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी हाल ही में कुशल कामगार तैयार करने और युवाओं को हुनरमंद बनाने के लिए स्किल इंडिया मिशन लांच किया है। मोदी जी अपनी सरकार बनने के बाद से ही स्किल डेवलपमेंट पर जोर देते रहे। अभी उन्होंने वर्ल्‍ड यूथ स्किल डे के अवसर पर इस मिशन की शुरुआत की जिससे इसकी अहमियत और बढ़ गई। सरकार का लक्ष्‍य इस मिशन के जरिए साल 2022 तक 40.2 करोड़ लोगों को प्रशिक्षित करना है। जिसमें 10.4 करोड़ युवाओं को स्किल ट्रेनिंग देकर ट्रेंड किया जाएगा जबकि इसी अवधि तक 29.8 करोड़ मौजूदा वर्कफोर्स को अतिरिक्‍त स्किल ट्रेनिंग भी इसके तहत देने की योजना है। दरअसल सरकार के स्किल इंडिया मिशन का मुख्‍य टारगेट भी यही है। इस मिशन के जरिए शिक्षा के साथ-साथ युवाओं को स्किल डेवलपमेंट में प्रशिक्षित करने पर रोजगार के अवसर उपलब्‍ध होंगे।
    स्किल इंडिया मिशन देश के लिए एक बड़ा अभियान है। इसके तहत सरकार असंगठित क्षेत्र के लोगों को ट्रेनिंग देगी। सरकार इस मिशन के जरिए युवाओं को हुनरमंद बनाकर रोजगार के काबिल बनाएगी जिसके लिए हर राज्‍य में स्किल यूनिर्वसिटी खोली जाएगी। इस मिशन के लिए सरकार ने इस साल बजट में 5,040 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। युवाओं की आँखे सपने देखने लगी हैं। नई पौध तैयार हो रही है। युवा भी सहयोग के लिए कमर कस रहे हैं। आने वाला कल भारतीय स्किल्स का है। इससे लाखों बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा। जीवन की सोच के साथ उद्देश्य बदल जायेगा। तब भारत का स्वरुप ही दूसरा हो जायेगा।
                                                              ————
                                                                                   – केशव मोहन पाण्डेय

Jul 5, 2015

सोशल नेटवर्किंग साइट्स और युवा-वर्ग


   आज का दौर युवाशक्ति का दौर है। भारत में इस समय 65 प्रतिशत के करीब युवा हैं। इन युवाओं को बड़ी ही सक्रियता से जोड़ने का काम सोशल मीडिया कर रहा है। युवा वर्ग में सोशल नेटवर्किंग साइट्स का क्रेज दिन-पर-दिन बढ़ता जा रहा है। युवाओं के उसी क्रेज़ के कारण आज सोशल नेटवर्किंग दुनिया भर में इंटरनेट पर होने वाली नंबर वन गतिविधि बन गया है। एक परिभाषा के अनुसार, ‘सोशल मीडिया को परस्पर संवाद का वेब आधारित एक ऐसा अत्यधिक गतिशील मंच कहा जा सकता है जिसके माध्यम से लोग संवाद करते हैं, आपसी जानकारियों का आदान-प्रदान करते हैं और उपयोगकर्ता जनित सामग्री को सामग्री सृजन की सहयोगात्मक प्रक्रिया के एक अंश के रूप में संशोधित करते हैं।’ सोशल नेटवर्किंग साइट्स युवाओं की जिंदगी का एक अहम अंग बन गया है। यह सही है कि इसके माध्यम से लोग अपनी बात बिना किसी रोक-टोक के देश और दुनिया के हर कोने तक पहुँचा सकते हैं, परन्तु इससे अपराधों में भी वृद्धि हुई है।
    विगत दिनों मेरे विद्यालय में बच्चों के लिए ‘सोशल नेटवर्किंग साइट्स एवं साइबर क्राइम’ पर आधारित एक कार्यशाला आयोजित किया गया था। कार्यशाला ले रहे थे देश के जाने माने साइबर एक्पर्ट रक्षित टण्डन। देश के लाखों लोगों की तरह रक्षित जी की प्रतिभा का मैं भी कायल हूँ। उनके चाहने वालों में से एक मैं भी हूँ। उनके प्रस्तुति की मेधा और ज्ञान की गरिमा से मैं भी आकर्षित रहता हूँ। उस कार्यशाला ने मुझे इतना प्रभावित किया कि मैं लिखने को बेचैन हो गया। लिखने बैठा तो कई बातें सामने आयीं। उन्हीं में से पता चला कि एक अध्ययन में यह दावा किया दावा किया गया है कि युवा वर्ग सोशल साइट्स में फेसबुक को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। निर्यातक कंपनी टी.सी.एस. की ओर से कराये गये सर्वे में युवाओं की सोशल साइट्स के बारे में प्रतिक्रिया जानने के बाद बताया गया कि फेसबुक को सबसे ज्यादा किशोर पसंद करते हैं।
    सर्वे से पता चला है कि फेसबुक के बाद युवाओं को गूगल प्लस और ट्विटर में रुची है। यह सर्वे 14 शहरों में कक्षा आठ से कक्षा 12 तक के 12,365 विद्यार्थियों से लिए गये राय पर आधारित हैं। सर्वेक्षण में शामिल लगभग 90 प्रतिशत विद्यार्थियों का कहना है कि वे फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं और फेसबुक उन्हें काफी पसंद है। वे छात्र किताबों को पढ़ने से अधिक सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपना समय बिताते रहते हैं। उसी सर्वे से ज्ञात होता है कि 65 प्रतिशत छात्रों ने गूगल प्लस तथा 44.1 प्रतिशत ने ट्वीटर के इस्तेमाल की बात कही है। इस सर्वेक्षण के अनुसार इसमें शामिल 45.5 प्रतिशत विद्यार्थियों का कहना है वे अपने स्कूली काम को निपटाने के लिए भी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट का इस्तेमाल करते हैं। उनके लिए सोशल नेटवर्किंग साइट्स सबसे उपयोगी साबित होता है। जहाँ तक पढाई का प्रश्न है तो विकिपीडिया 63.1 प्रतिशत के साथ पहले नंबर पर है। यह एक सार्थक और सकारात्मक पक्ष है।
    भारत सहित दुनिया के विभिन्न देशों में सोशल मीडिया ने सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं बल्कि कई सामाजिक व गैर-सरकारी संगठन भी अपने अभियानों को मजबूती दी है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स राजनैतिक पहलुओं को भी समझने और राजनैतिक विचारधाराओं को समझने में भी अमह भूमिका का निर्वहन कर रहा है। सोशल मीडिया सिर्फ अपना चेहरा दिखाने का माध्यम नहीं रह गया है, वह सामाजिक सोच और धार्मिक कट्टरता को भी स्पष्ट करने का माध्यम है। सोशल मीडिया सामाजिक कुण्ठाओं, धार्मिक विचारों पर अपना पक्ष तो रखता ही है, जिन देशों में लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है, वहाँ भी अपनी बात कहने के लिए लोगों ने सोशल मीडिया का लोकतंत्रीकरण भी किया है। आज दुनिया का हर छठा व्यक्ति सोशल मीडिया का उपयोग कर रहा हैं। वर्तमान में यह सोशल मीडिया लोगों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया हैं। हम अगर किसी से नाराज हैं, किसी की बातों का प्रत्यक्ष प्रत्युत्तर नहीं दे पाते हैं, किसी ने आपको प्रसन्नता दी, किसी ने आपका दिल तोड़ा, कुछ अच्छा या बुरा खाए, किए, आज का युवा हर अगले मिनट अपना स्टेटस अपडेट करता रहता है। हमें जिसकी अज्ञानता पर आश्चर्य होता रहता है, वह भी पचास तार्किक सिद्धांतों से अपना प्रोफाइल भर देता है। सोसल साइट्स आज मन की भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम ही नहीं, मन को जोड़ने का भी साधन है। मन का राग-द्वेष, पीड़ा-शूल सब कुछ सहन करते ये अभिव्यक्ति के माध्यम कुंठित और प्रफुल्लित हृदय की भी अभिव्यक्ति हैं। अभिव्यक्ति के इन्हीं माध्यमों को दस्तावेज के तौर पर देखें तो लोगों की बेबाक एवं अवाक् टिप्पणियों से शब्दों का महत्त्व और मायने साफ हो जाता है। साफ हो जाता है कि कितने मायने रखते हैं वे शब्द जो हमारे मुखारबिंद से निकलते हैं और कितना उनका असर होता है सामने वाले पर और खुद अपने ही व्यक्तित्व पर।
    युवाओं के जीवन में सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने क्रांतिकारी परिवर्तन लाया है। अगर इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा जारी आंकड़ों की माने तो भारत के शहरी इलाकों में प्रत्येक चार में से तीन व्यक्ति सोशल मीडिया का किसी-न-किसी रूप में प्रयोग करता है। इसी रिपोर्ट में 35 प्रमुख शहरों के आंकड़ों के आधार पर यह भी बताया गया कि 77 प्रतिशत उपयोगकर्ता सोशल मीडिया का इस्तेमाल मोबाइल से करते हैं। सोशल मीडिया तक पहुँच कायम करने में मोबाइल का बहुत बड़ा योगदान है और इसमें भी युवाओं की भूमिका प्रमुख है। भारत में 25 साल से अधिक आयु की आबादी 50 प्रतिशत और 35 साल से कम आयु की 65 प्रतिशत है। इससे देखते हुए आँकड़े बताते हैं कि भारत में सोशल मीडिया पर प्रतिदिन करीब 30 मिनट समय लोगों द्वारा व्यतीत किया जा रहा है। इनमें अधिकतम कालेज जाने वाले विद्यार्थी (82 प्रतिशत) और युवा (84 प्रतिशत) पीढ़ी के लोग शामिल हैं। सोशल साइट्स ने स्कूली दिनों के साथियों से मिलवाया तो आज देश-दुनिया के कोने में रहने वाले मित्र भी एक-दूसरे को फेसबुक पर ढूँढ़ रहे हैं। सोशल मीडिया के द्वारा जिनसे वास्तविक जीवन में मुलाकातें भले ही न पाये पर सोशल साइट्स पर हमेशा जुड़े रहते हैं। सोशल मीडिया की सफलता इससे भी देखी जा सकती है कि परंपरागत मीडिया भी अब फेसबुक व ट्विटर जैसे माध्यमों पर न सिर्फ अपने पेज बनाकर उपस्थिति दर्ज करा रही है, बल्कि विभिन्न मुददों पर लोगों द्वारा व्यक्त की गयी राय को इस्तेमाल भी कर रही है। मैं स्वयं करीब 70 प्रतिशत ऐसे लोगों से जुड़ा हूँ, जिनसे प्रत्यक्ष रूप से कभी मिला नहीं। परन्तु हमारी आदतें, हमारी अभिरूचि, हमारा सोच आदि में मेल है और हम चैटिंग, व्हाट्सएप आदि पर अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। मेरे कई साहित्यिक अभिरूचि के मित्रों की प्रतिक्रियाएँ मुझे प्रभावित करती हैं और कइयों के विचारों का मैं समर्थन भी करता हूँ।
    फेसबुक, ट्वीटर, व्हाट्सएप, ऑरकुट, गूगल़, इंस्टाग्राम, पिनइंटेरेस्ट, ब्लॉग आदि सोशल मीडिया के और न जाने कितने ही रूप इन दिनों इंटरनेट की मायावी दुनिया में शुमार हो चुके हैं और इनके उपयोग करने वालों की संख्या भी रोज बढ़ती जा रही है। आज के इंटरनेट आधारित समय में हम वर्चुअल वर्ल्ड में जीते हैं, जिसका कोई ठोस अस्तित्व नहीं होता, जिसमें दिन या रात का कांसेप्ट नहीं होता, जिसमें कभी भी छुट्टी नहीं होती, ना ही कभी तालाबंदी होती है। यानी ये 24 गुणे 7 की शैली दुनिया के हर कोने के लोगों को हर पल आपस में जोड़े रखने में सक्षम है। सार्वदेशिक और सार्वकालिक है। सीमाओं से परे है। बहुत हद तक उम्र और संवेदनाओं से परे भी। इनके जरिए कहीं भी चार लोग उठते-बैठते नहीं देखे जा सकते। लेकिन सोशल मीडिया के जरिए इस प्रक्रिया को महसूस किया जा सकता है क्योंकि ये दुनिया सदैव जीवंत है। हर पल इसके जरिए हम किसी से भी जुड़ सकते हैं, बातें कह सकते हैं, अपनी सुना सकते हैं, उसकी सुन सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि ठोस रूप में आमने-सामने न होने की वजह से आपस में कोई असहज स्थिति नहीं आ सकती। एक-दूसरे में हाथापाई या सिर-फुटव्वल नहीं हो सकता। इससे बेलगाम तरीके से एक-दूसरे को कुछ भी कहने, गाली-गलौच तक की सुविधा आसान है। ये भी सुविधा है कि ऐसी स्थिति में जिससे बात करना या जिसकी बात सुनना न चाहें, उसे अनफ्रेंड कर दें, या ब्लॉक कर दें। सोशल मीडिया ने जीवनशैली को बहुत ही प्रभावित किया है। आज परिवार में चार सदस्यों के मिलने पर बातें नहीं होतीं, विचारों का आदान-प्रदान नहीं होता। सब मोम का पुतला बन कर अपने हेंडसेट्स के जरिए सोशल बनने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं। यह आज की विडंबना है कि हम पारिवारिक तो बन नहीं पाते और सोशल बनने की होड़ में लगे रहते हैं।
    जिस तरीके से इंटरनेट पर मेल और चैटिंग की सुविधा ने पारंपरिक डाक व्यवस्था और टेलीफोन को किनारे कर दिया है, उसी तरीके से अब इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया भी पारंपरिक सामाजिक व्यवहार में कई तरह के बदलाव लाता दिख रहा है। इस सिलसिले में सबसे बड़ा मुद्दा है समय का। काफी लोगों की शिकायत रहती है कि सोशल मीडिया उनका समय बर्बाद करता है। आलसी बना देता है। परोक्ष रूप से आपकी जेब भी काट लेता है क्योंकि आज सोशल मीडिया पर जब सक्रिय रहते हैं तो इसका हिसाब रख पाना बेहद कठिन होता है कि असल में इंटरनेट का कितना चार्ज सर्विस प्रोवाइडर कंपनियाँ वसूल रही हैं और कई बार जब महीने का बिल आपके हाथ में आता है, तो आप हिसाब जोड़ते फिरते हैं कि आखिर कैसे बिल इतना बढ़ गया। इतना ही नहीं, हम सोशल साइट्स पर वास्तविकता को छुपाना चाहते हैं, अपनी कल्पनाओं को दिखाने में लगे रहते हैं। देश में कई ऐसी घटनाएँ सामने आयी हैं कि एक 35-40 साल का युवा 20-22 साल अपनी उम्र डालकर तथा कोई स्मार्ट सा फोटो डाल कर अपना प्रोफाइल बनाता है। उसकी प्रस्तुत करने की बेजोड़ क्षमता से आकर्षित होकर कई टीन एजर लड़कियाँ मित्र बना लेती हैं, बन जाती हैं। बात में मिलना-मिलाना, शादी का झाँसा और फिर शारीरिक संबंध। ऐसे युवाओं से कहना चाहूँगा कि यार दोस्ती ही करनी है तो परिचितों से क्यों नहीं? नए-नए पोज़ का सेल्फी सेकेण्ड में सोशल साइट्स पर डाल दिया जाता है। किसी अपरिचित मित्र का कमेन्ट आता है ‘वाॅउ’। आप रिप्लाई करते हो ‘थैंक यू’। फिर अनाप-सनाप कमेंट। जरा सोचो कि क्या राह चलते कोई लड़का तुम्हें देखकर ‘वाॅउ’ करे तो तुम ‘थैंक यू’ बोलोगे? अगर कोई आपके प्रोफाइल फोटो पर ‘क्या हाॅट है’ कमेंट करता है तो आप दिल या स्माइल का सिममबल भेजते हो, मगर वहीं लड़का आपके सामने आकर बोले तो आप उसे छेड़ने की जुर्म में अंदर करवा दोगे। जरा सोचिए कि क्या हम इतना भी रियल नहीं रह गए। सोशल साइट्स पर अभद्र कमेंट करना उतना ही अपराध है जितना प्रत्यक्ष।
    अक्सर युवावर्ग में ऐसा देखा जाता है कि वह सोशल मीडिया पर ज्यादा से ज्यादा व्यस्त रहता है। दोस्तों से गप्पें लड़ाने में, लड़कियों को पटाने की कोशिश में, या फिर गेमिंग और ऐसी हरकतों में जिनसे उनके करियर या जिंदगी में कोई फायदा तो नहीं ही हो सकता। ऐसे चंद, बिरले ही युवा हैं, जिनकी सोशल मीडिया पर सक्रियता उनके लिए किसी तरह से लाभकारी साबित हुई हो, चाहे काम-काज या नौकरी के सिलसिले में या फिर निजी जीवन के किसी पहलू में। ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं, जिनमें सोशल मीडिया के अधिकाधिक इस्तेमाल से किसी व्यक्ति का भला हुआ हो। सोशल मीडिया पर दोस्ती बढ़ाकर लड़कियों को ठगे जाने के मामले रोज ही सामने आते हैं। दो-चार दिल सोशल मीडिया के जरिए भले ही आपस में जुड़ गए हों, लेकिन न जाने कितने ही दिल टूटने की खबरें अक्सर आती रहती हैं। कई मेट्रोमोलियल साइट्स पर अपना प्रोफाइल कुछ और बनाते हैं और होते कुछ और हैं। आये दिन इस प्रकार से ठगे जाने की शिकायतें आती रहती हैं। कई ऐसी घटनाएँ हैं जहाँ हम स्वयं को अच्छा और धनी दिखाने के चक्कर में लोगों की महँगी गाडि़यों के सामने अपनी सेल्फी लेकर डाल देते हैं और सामने वाले का नियत बदल जाता है तथा अपहरण और फिरौती जैसी घटनाएँ सामने आ जाती हैं। गुजरात की घटना प्रमाण है इसका। अतः युवावर्ग को सावधानी के साथ सोशल मीडिया का उपयोग करना चाहिए। अगर हम लंदन, न्यूयार्क या कनाडा छुट्टियाँ मनाने जा रहे हैं तो हमें इसे अपडेट करते समय भी सावधान रहना चाहिए।
    सोशल मीडिया के इस्तेमाल के कई आयाम हैं। कई लोग ये भी कह सकते हैं कि सोशल मीडिया उनके लिए काफी लाभकारी है। निस्संदेह, यह मेरे लिए भी अधिकांशतः लाभकारी सिद्ध हुआ है। यदि किसी को अपनी बात रखनी है, तो उसके लिए यह एक बढि़या मंच है, जहाँ पर हम अपने विचारों पर तुरंत प्रतिक्रिया भी पा जाते हैं। जिस पर हमारे कथित दोस्त और दुश्मन भी आपकी राय जान सकते हैं। हमारे विचारों से परिचित हो सकते हैं और उस पर अपना नजरिया पेश कर सकते हैं। कारोबारियों के लिए सोशल मीडिया अपने ब्रांड प्रमोशन का जरिया बन गया है। पेज बनाकर उसे लाइक करने और करवाने की कोशिशें प्रमोशन के फंडे में शामिल हो गई हैं। राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के लिए भी सोशल मीडिया अपनी बात लोगों के सामने लाने का एक सशक्त औजार बन गया है और सिर्फ अपनी बात सामने रखने का ही नहीं, उस पर फीडबैक हासिल करने का भी ये एक बड़ा जरिया है, क्योंकि किसी पक्ष की ओर से कोई बात फेसबुक या ट्विटर पर कही जाती है तो जल्द से जल्द उस पर प्रतिक्रियाएँ आनी शुरु हो जाती हैं। वैसे कई बार स्वयं को असहाय अनुभव करने पर ये सोशल साइट्स हमारे सहयोगी सिद्ध होते हैं। अभी हाल ही में एक प्रतियोगिता के लिए एक नाटक की तैयारी चल रही थी। कल सुबह 7 बजे रिर्पोटिंग है और शाम को 7 बजे एक छात्रा के पिता ने शहर से बाहर जाने की विवशता बता कर मना कर दिया। मेरी क्या दशा हुई होगी, आप सहज कल्पना कर सके हैं। फिर एक छात्रा के पिता से बात हुई, वे तैयार हुए और मुझे स्क्रीप्ट मेल करने को बोले। तबतक रात का 10 बज चुका था। फिर उन्होंने बताया कि प्रिंट तो नहीं हो पाएगा। वहाँ व्हाट्सएप ने साथ दिया। कई बार कुछ विचार आते हैं और तत्काल फेसबुक और ट्वीटर पर अपडेट कर के हम दूसरों की राय ले लेते हैं। अभी हाल ही में मुझे अपने गृहनगर में एक कार्यक्रम में बोलना था मगर कोई स्क्रीप्ट नहीं था। मेरा हेंडसेट था और उसी मुद्दे पर मैं अपने ब्लाॅग पर लिख चुका था। तुरन्त अपने उस पोस्ट को ओपेन किया और एक पसंदीदा वक्ता का प्रमाण दे दिया। कई बार अपने ज्ञान को दिखाने के लिए भी गुगल आदि का उपयोग मैं धड़ल्ले से करता रहता हूँ।
    युवाओं से मैं बतना चाहूँगा कि आज हम लाख प्रयास करें तब भी सोशल मीडिया से दूर नहीं रह सकते। रहना भी नहीं चाहिए। समय के साथ गतिशील रहना ही एक जागरूक युवा की पहचान है। बस हमें थोड़ा सावधान रहना चाहिए जिससे कि कोई हमें चिट न करे। हम किसी को चिट न करे। हमें ध्यान रखना चाहिए कि सोशल मीडिया पर आकर्षक दिखने वाला प्रोफाइल कोई आवश्यक नहीं कि वास्तव में वैसा ही हो। हमें सोशल साइट्स का उपयोग अपने या किसी और के जीवन का बंटाधार करने में नहीं, उसे सँवारने में लगाना चाहिए।
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                                                                         – केशव मोहन पाण्डेेय

Jun 7, 2015

कुतर्क छोड़िये


कृपया एक मिनट समय दीजिये -
     "सुना है मैगी मे थोडा रासायन बढ गया, इसलिए उस पर बैन लगेगा....
     तम्बाकू, सिगरेट और शराब मे सरकार को, उम्र बढाने के कौनसे
     विटामिन, प्रोटीन दिखे जिनके लाईसेन्स वो रोज जारी कर रही है.".

    लोग मैगी पर बैन के विरोध में उपरोक्त तर्क दे रहे हैं। मैं अपने उन भाइयों से बताना चाहूँगा कि ‘बस दो मिनट’ में तैयार होने वाली मैगी आपके नौनिहालों की सेहत भी दांव पर लगा सकती है। खाद्य संरक्षा व औषधि प्रशासन (एफएसडीए) ने हाल ही बाराबंकी के एक मल्टी स्टोर से लिए गए मैगी के नमूनों की जांच कोलकाता की रेफरल लैब से कराई। जांच में यह नमूना फेल हो गया और इसमें मोनोसोडियम ग्लूटामेट नाम का एमिनो एसिड खतरनाक स्तर तक पाया गया। मैगी में प्रयोग किये गए रसायन एमएसजी की मात्रा का मानक 2.5 रखा गया है और कंपनी 17.65 प्रयोग कर रही है, जो बच्चों के लिए बेहद नुकसानदायक है। एफएसडीए एक्ट के तहत मोनोसोडियम ग्लूटामेट का प्रयोग किए जाने वाली सामग्री के रैपर पर इसकी मौजूदगी साफ-साफ दर्ज करनी होती है। साथ यह भी लिखना होता है कि 12 साल से कम उम्र के बच्चे इसका कतई प्रयोग न करें।एमीनो एसिड श्रेणी का मोनोसोडियम ग्लूटामेट केमिकल वाली खाद्य सामग्री बच्चों की सेहत दांव पर लगा सकती है।यह केमिकल खाने से बच्चे न केवल इसके एडिक्ट हो सकते हैं बल्कि दूसरी चीजें खाने से नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। मैगी खाने वाले छोटे बच्चों के शारीरिक विकास पर भी असर पड़ता है। मोनोसोडियम ग्लूटामेट बच्चों की पाचन क्षमता खराब कर देता है। इससे बच्चों में पेट में दर्द, रोटी-सब्जी, फल खाने पर उल्टी आने, शरीर में सुस्ती, गर्दन के पीछे की नसों के कमजोर होने से स्कूली बस्ते तक का भार न उठा पाने और याददाश्त कमजोर होने की शिकायत हो सकती है। 
    जहाँ तक उपरोक्त उत्पादों की बात है, यह तो सभी जानते हैं कि तम्बाकू, सिगरेट और शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। लोग तो इस व्यसन को जानबूझ कर अपनाते है। दूसरी बात कि लोग भले स्वयं इस व्यसन में डूब जाते हैं, मगर अपनी संतानों को तो दूर रखते हैं और मैगी को हम खुद ही बच्चों को दे रहे हैं। तब मुझे उपर्युक्त तर्क फालतू और खुद से ही बेमानी लगता है। इस हाल में भी तम्बाकू, सिगरेट और शराब आदि पर 60 प्रतिशत हिस्से में वैधानिक चेतावनी लगी रहती है और यहाँ तो नेस्ले कंपनी अपनी गलती तक नहीं मान रही है।
    फिर भी बच्चों की बात है। सोचना तो पड़ेगा ही। सोचिये! तर्क के साथ सोचिये। कुतर्क छोड़िये। 
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                                                                          - केशव मोहन पाण्डेय